Tuesday, March 3, 2020

हेट स्पीच और राजद्रोह में पुलिस की मनमानी की वजह क्या है?

हेट स्पीच और राजद्रोह. ये दो शब्द पिछले कुछ दिनों से भारत, ख़ासकर राजधानी दिल्ली को लेकर चर्चा में हैं.

दिल्ली में भड़की हिंसा के पीछे हेट स्पीच या नफ़रत भरी और भड़काऊ बातों को ज़िम्मेदार माना जा रहा है और इस संबंध मे दिल्ली हाई कोर्ट में भी एक याचिका पर सुनवाई चल रही है.

याचिकाकर्ता जहां बीजेपी नेताओं के भाषाओं को भड़काऊ बताते हुए एफ़आईआर की मांग कर रहे हैं वहीं पुलिस का कहना है कि यह एफ़आईआर के लिए उचित समय नहीं है.

इसके अलावा जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और सीपीआई नेता कन्हैया कुमार पर 2016 में दर्ज राजद्रोह के मामले में मुक़दमा चलाने को मंज़ूरी मिलने को लेकर भी चर्चा है. सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर दिल्ली सरकार ने क्यों मंज़ूरी देने में इतनी देरी की.

हेट स्पीच और राजद्रोह के मामलों में केंद्र से लेकर राज्यों में सत्ता पर रहे विभिन्न दलों पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगते रहे हैं.

यह देखा जाता रहा है कि कुछ मामलों में तो पुलिस तुरंत हरकत में आकर मामला दर्ज कर लेती है और गिरफ्तारी भी कर लेती है जबकि वैसा ही सत्ताधारी पार्टी का करीबी करे तो वह सुस्त या निष्क्रिय रहती है.

फ़ेसबुक पर सत्ताधारी नेताओं के ख़िलाफ़ की जाने वाली टिप्पणियों पर होने वाली पुलिस कार्रवाई के उदाहरण भी हाल के सालों में बढ़े हैं. बीते साल उत्तर प्रदेश में छह लोगों को सीएम योगी आदित्यनाथ पर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने पर गिरफ़्तार कर लिया गया था. फिर त्रिपुरा में सीएम के ख़िलाफ़ फ़ेसबुक पर कथित फ़र्ज़ी खबर डालने पर एक शख़्स की गिरफ़्तारी हुई थी.

राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत पर टिप्पणी करने पर दो लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर हुई थी. पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर टिप्पणी करने पर 28 साल के युवक को बीते साल गिरफ़्तार किया गया था.

अब असम के सिल्चर में एक अध्यापक फ़ेसबुक पर प्रधानमंत्री मोदी के लिए 'जन संहार करने वाला' कहने पर गिरफ़्तार कर लिया गया.

गुरुचरण कॉलेज के भौतिकी विभाग में अनुबंध अध्यापक सौरादीप सेनगुप्ता पर आरोप है कि उन्होंने कथित तौर पर फ़ेसबुक पोस्ट में 'हिंदू धर्म को लेकर आपत्तिजनक शब्द इस्तेमाल किए थे' और बीजेपी समर्थकों को 'आतंकवादी' कहा था.

छात्रों द्वारा करवाई गई एफ़आईआर के आधार पर सेनगुप्ता पर आईपीसी और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि फ़ेसबुक पर की गई टिप्पणियों पर अलग-अलग दलों के शासन वाले राज्यों की पुलिस ने ये कार्रवाईं तब कीं जब सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में ही आईटी एक्ट की धारा 66A को ख़त्म कर दिया था. इसके तहत दूसरों को आपत्तिजनक लगने वाली कोई भी जानकारी भेजना दंडनीय अपराध था.

मगर विभिन्न राज्यों में इसका दुरुपयोग देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अवंसैधानिक क़रार दिया था. फिर भी क्यों सोशल मीडिया पोस्ट्स के आधार पर सख़्त कार्रवाइयां हो रही हैं और सत्ताधारी दलों पर असहमतियों को विभिन्न क़ानूनों से आधार पर दबाने का आरोप लग रहा है?

सबसे अहम सवाल कि हेट स्पीच और राजद्रोह जैसे मामलों का दुरुपयोग कैसे रोका जा सकता है?

इन सब सवालों को लेकर बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विराग गुप्ता से बात की. आगे पढ़ें उनका नज़रिया, उनके शब्दों में.

हेट स्पीच और राजद्रोह, दोनों ही तरह के मामलों में राज्य और केंद्र सरकारों के बीच गुत्थियां उलझी हुई हैं.

हेट स्पीच यानी भड़काऊ या नफ़रत भरी बातें अपराध हैं और राज्यों का विषय है. इसी कारण इस तरह के मामलों में राज्य सरकारों की इच्छा के आधार पर कार्रवाई होती हैं.

अगर राज्य सरकारों को राजनीतिक रूप से उचित लगता है तो वे इस तरह के मामलों में कार्रवाइयां करती हैं और अगर उन्हें सूट न करे तो नहीं करतीं.

मगर हेट स्पीच के मामलों का पहलू केंद्र से भी जुड़ा है. आजकल अधिकतर हेट स्पीच सोशल मीडिया पर देखने को मिल रही है. इसके लिए आईटी एक्ट बनाया गया है.

अगर सोशल मीडिया पर कही गई हेट स्पीच के मामले में कार्रवाई करनी है तो सोशल मीडिया कंपनियों से जानकारी लेनी होगी और ऐसा करने का अधिकार सिर्फ़ केंद्र के पास है.

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2015 में आईटी एक्ट के सेक्शन 66 ए को पूरी तरह ख़त्म कर दिया था. इसे साल 2009 में एक संशोधन के ज़रिये जोड़ा गया था.

अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकार इस सेक्शन के ख़िलाफ़ थे और उनका मानना था कि इसका दुरुपयोग किया जा रहा है.

जब सुप्रीम कोर्ट ने इसे ख़त्म किया तो उसके बाद कोई नया क़ानूनी विकल्प नहीं बना.

सेक्शन 66 A को हटाना एक तरह से तकनीकी रूप से ग़लत फ़ैसला था क्योंकि यह आईपीसी का मिरर था.

इसका विकल्प न आने का नुक़सान यह हुआ कि पहले छोटे रूप में इस क़ानून का दुरुपयोग होता था मगर अब आईपीसी के प्रावधान लगाकर बड़े रूप में दुरुपयोग हो रहा है.

जो मामले आईटी एक्ट के तहत सुलझाए जा सकते थे, वे आईपीसी की धाराओं के तहत आने लगे हैं. यह तो और भी ग़लत बात है.

सेडिशन या राजद्रोह के मामलों में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच उलझाव है.

स तरह के मामलों में कार्रवाई राज्य सरकारों को करनी होती है मगर राष्ट्रीयता और सुरक्षा जैसे मसले संघीय व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार के पास होते हैं.

इसके अलावा पुलिस को कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकार से मंज़ूरी भी चाहिए होती है.

इस तरह के मामलों में अलग-अलग सरकारों के रवैये और अलग-अलग अदालतों के रुख़ से भी भारी समस्या हो रही है.

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